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CTET 2 Social and Science 22 Dec 2021 Paper
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Question Numbers: 121-128
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर, पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए-
हमारे संविधान में स्त्री-पुरुष दोनों को हर दृष्टि से समान समझा गया है, साथ ही उन सभी प्रथाओं के त्याग की बात कही गई है जिनसे नारी के आत्म सम्मान पर आँच आती हो। यह सर्वमान्य तथ्य है कि हमारी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय संरचना नर-नारी दोनों के परस्पर सहयोग और सहभागिता पर ही निर्भर है। पारिवारिक व्यवस्था का तो पूरा उत्तरदायित्व ही नारी पर रहता है। मानव समाज की रचना में दोनों का समान योगदान है। यह सब होते हुए भी हमारा समाज पुरुष को श्रेष्ठ और नारी को हीन मानता है।
हमारा वैदिक कालीन इतिहास इस देश में नर-नारी समानता का एक उज्जवल उदाहरण है। उस समय में नारी का बहुत ऊँचा स्थान था। परदे की प्रथा नहीं थी। उनके लिए शिक्षा के द्वार खुले थे। अनेक स्त्रियाँ ऋषि - पद पर प्रतिष्ठित थीं। वे शास्त्रार्थों में खुलकर भाग लेती थीं, धार्मिक और सामाजिक कार्यों में हाथ बँटाती थीं तथा युद्ध में भाग लेती थीं| विवाह के मामले में उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त थी| बाल विवाह की प्रथा नहीं थी। विधवा विवाह का निषेध नहीं था। सती प्रथा का तो कहीं नाम भी नहीं था। परिवार में स्त्री का बहुत सम्मान था। वह यज्ञ करती थी, दान देती थी। यज्ञ में पति के साथ पत्नी के बैठे बिना यज्ञ पूरा नहीं माना जाता था। मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।
कालांतर में यह स्थिति नहीं रही। सार्वजनिक कार्यों से हटकर उसका जीवन घरेलू काम-काज में ही बीतने लगा।
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर, पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए-
हमारे संविधान में स्त्री-पुरुष दोनों को हर दृष्टि से समान समझा गया है, साथ ही उन सभी प्रथाओं के त्याग की बात कही गई है जिनसे नारी के आत्म सम्मान पर आँच आती हो। यह सर्वमान्य तथ्य है कि हमारी पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय संरचना नर-नारी दोनों के परस्पर सहयोग और सहभागिता पर ही निर्भर है। पारिवारिक व्यवस्था का तो पूरा उत्तरदायित्व ही नारी पर रहता है। मानव समाज की रचना में दोनों का समान योगदान है। यह सब होते हुए भी हमारा समाज पुरुष को श्रेष्ठ और नारी को हीन मानता है।
हमारा वैदिक कालीन इतिहास इस देश में नर-नारी समानता का एक उज्जवल उदाहरण है। उस समय में नारी का बहुत ऊँचा स्थान था। परदे की प्रथा नहीं थी। उनके लिए शिक्षा के द्वार खुले थे। अनेक स्त्रियाँ ऋषि - पद पर प्रतिष्ठित थीं। वे शास्त्रार्थों में खुलकर भाग लेती थीं, धार्मिक और सामाजिक कार्यों में हाथ बँटाती थीं तथा युद्ध में भाग लेती थीं| विवाह के मामले में उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त थी| बाल विवाह की प्रथा नहीं थी। विधवा विवाह का निषेध नहीं था। सती प्रथा का तो कहीं नाम भी नहीं था। परिवार में स्त्री का बहुत सम्मान था। वह यज्ञ करती थी, दान देती थी। यज्ञ में पति के साथ पत्नी के बैठे बिना यज्ञ पूरा नहीं माना जाता था। मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।
कालांतर में यह स्थिति नहीं रही। सार्वजनिक कार्यों से हटकर उसका जीवन घरेलू काम-काज में ही बीतने लगा।
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Question : 121 of 150
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