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गांधीजी मानते थे कि सामाजिक या सामूहिक जीवन की आर बढ़ने से पहले कौटुम्बिक जीवन का अनुभव प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए वे आश्रम-जीवन बिताते थे। वहाँ सभी एक भोजनालय में भोजन करते थे। इससे समय और धन तो बचता ही था, सामूहिक जीवन का अभ्यास भी होता था, लेकिन यह सब होना चाहिए, समय-पालन, सुव्यवस्था ओर शुचिता के साथ।
इस ओर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए गांधीजी स्वयं भी सामूहिक रसोईघर में भोजन करते थे। भोजन के समय दो बार घण्टी बजती थी, जो दूसरी घण्टी बजने तक भोजनालय में नहीं पहुँच पाता था, उसे दूसरी पंक्ति के लिए बरामदे में इन्तजार करना पड़ता था। दूसरी घण्टी बजते ही रसोईघर का द्वारा बन्द कर दिया जाता था, जिससे बाद में आने वाले व्यक्ति अन्दर न आने पाएं।
एक दिन गांधीजी पिछड़ गए। संयोग से उस दिन आश्रमवासी श्री हरिभाऊ उपाध्याय भी पिछड़ गए। जब वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि बापू बरामदे में खड़े हैं। बैठने के लिए न बैंच है, न कुर्सी। हरिभाऊ ने विनोद करते हुए कहा, 'बापूजी आज तो आप भी गुनहगारों के कठघरे में आ गए हैं। गांधीजी खिलखिलाकर हँस पड़े। बोले, 'कानून के सामने तो सब बराबर होते हैं न?'
हरिभाऊ जी ने कहा, 'बैठने के लिए कुर्सी लाऊँ' बापू?' गांधीजी बोले, ' नहीं, उसकी जरूरत नहीं है। सजा पूरी भुगतनी चाहिए। उसी में सच्चा आनन्द है।
भाग-V : भाषा-II हिन्दी
निर्देश- गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों (प्र.सं. 121 से 129) में सबसे उचित विकल्प चुनिए- गांधीजी मानते थे कि सामाजिक या सामूहिक जीवन की आर बढ़ने से पहले कौटुम्बिक जीवन का अनुभव प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए वे आश्रम-जीवन बिताते थे। वहाँ सभी एक भोजनालय में भोजन करते थे। इससे समय और धन तो बचता ही था, सामूहिक जीवन का अभ्यास भी होता था, लेकिन यह सब होना चाहिए, समय-पालन, सुव्यवस्था ओर शुचिता के साथ।
इस ओर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए गांधीजी स्वयं भी सामूहिक रसोईघर में भोजन करते थे। भोजन के समय दो बार घण्टी बजती थी, जो दूसरी घण्टी बजने तक भोजनालय में नहीं पहुँच पाता था, उसे दूसरी पंक्ति के लिए बरामदे में इन्तजार करना पड़ता था। दूसरी घण्टी बजते ही रसोईघर का द्वारा बन्द कर दिया जाता था, जिससे बाद में आने वाले व्यक्ति अन्दर न आने पाएं।
एक दिन गांधीजी पिछड़ गए। संयोग से उस दिन आश्रमवासी श्री हरिभाऊ उपाध्याय भी पिछड़ गए। जब वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि बापू बरामदे में खड़े हैं। बैठने के लिए न बैंच है, न कुर्सी। हरिभाऊ ने विनोद करते हुए कहा, 'बापूजी आज तो आप भी गुनहगारों के कठघरे में आ गए हैं। गांधीजी खिलखिलाकर हँस पड़े। बोले, 'कानून के सामने तो सब बराबर होते हैं न?'
हरिभाऊ जी ने कहा, 'बैठने के लिए कुर्सी लाऊँ' बापू?' गांधीजी बोले, ' नहीं, उसकी जरूरत नहीं है। सजा पूरी भुगतनी चाहिए। उसी में सच्चा आनन्द है।
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